ूःतावना 
यऽ नायर्ःतु पूज्यन्ते रमन्ते तऽ देवता। 
'िजस कु ल में ि यों का आदर है वहाँ देवता प ्रसन ्न रहते हैं।' 
इस प ्रक...
आर्त भक्त िौपदी .............................................................................................................
द
प
ेने की िदव्य भावना.......................................................................................................
'जन्मदाता और पालनकतार् होने के कारण सब पूज्यों में पूज्यतम जनक और िपता कहलाता है।
जन्मदाता से भी अन्नदाता िपता ौे है। इनसे...
सुयशा कै से कहती िक 'मैं भजन गाना नहीं जानती हँू। मैं नहीं आऊँ गी...' राज्य में रहती है और महल
के अंदर माँ काम करती है। मा...
कब सुिमरोगे राम? साधो ! कब सुिमरोगे राम? 
झूठी काया झूठी माया, आिखर मौत िनशान। 
कहत कबीर सुनो भई साधो, जीव दो िदन का मेहमा...
रवाना कर दँूगा। जब राजा अपना है तो पुिलस की ऐसी-तैसी... पुिलस क्या कर सकती है? पुिलस के अिधकारी
तो जानते हैं िक राजा का आद...
तू नाटक कर लेः 'हाय रेऽऽऽ ! मेरी बेटी मर गयी। वह अब मुझे नहीं िमलेगी, नदी में डूब गयी...' ऐसा करके
तू भी यहाँ से भाग जा।"
...
"बड़ी खूबसूरत है।"
"महाराज आप तो संत आदमी हैं।"
"तभी तो कहता हँू िक बड़ी खूबसूरत है, बड़ी होनहार है। मेरी होगी तू?"
पुजािरन-प...
इस तरह िदन बीते..... स ाह बीते.. महीने बीते। सुयशा की साधना बढ़ती गयी.... अब तो वह बोलती
है तो लोगों के दयों को शांित िमलती...
और मैंने उसकी हत्या करवा दी। कालू ! मेरा िदल जल रहा है। कमर् करते समय पता नहीं चलता,
कालू ! बाद में अन्दर की लानत से जीव त...
हमारे देश की कन्याएँ परदेशी भोगी कन्याओं का अनुकरण क्यों करें? लाली-िलपिःटक लगायी...
'बॉयकट' बाल कटवाये... शराब-िसगरेट पी....
रानीः "नाथ ! मैंने बाल्यकाल में दुवार्सा ऋिष से िशवमंऽ िलया था। उसे जपने से मेरी साि वक ऊजार्
का िवकास हुआ है, इसीिलए मैं ...
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
अनुबम
लोग घरबार छोड़कर साधना करने के िलए साधु बनते हैं। घर में रहते हुए, गृहःथधमर् िनभाते हुए नारी
...
इस ूकार कहकर महिषर् याज्ञवल्क्यजी ने उपदेश देना आरंभ िकयाः "मैऽेयी ! तुम जानती हो िक ी
को पित और पित को ी क्यों िूय है? इस...
अनुबम
ॄ वािदनी िवदुषी गाग
ॄ वािदनी िवदुषी गाग का नाम वैिदक सािहत्य में अत्यंत िव यात है। उनका असली नाम क्या था,
यह तो ज्ञा...
वाचक्नवी गाग ने पूछाः "भगवन ! यह जो कु छ पािथर्व पदाथर् हैं, वे सब जल में ओत ूोत हैं। जल िकसमें
ओतूोत है? 
याज्ञवल्क्यजीः ...
गाग ः "अच्छा... अब दूसरा ू ः यह आकाश िकसमें ओतूोत है?" 
याज्ञवल्क्यजीः "इसी त व को ॄ वे ा लोग अक्षर कहते हैं। गाग यह न ःथू...
गालवजी और गरुड़जी का यह देखकर पुनः िवचारने लगे िक 'अप्सराओं को भी मात कर देने वाले
सौन्दयर् की ःवािमनी यह शाण्डािलनी अगर तप...
सािवऽी बोलीः "सत्पुरुषों का संग एक बार भी िमल जाये तो वह अभी की पूितर् कराने वाला होता है
और यिद उनसे ूेम हो जाये तो िफर क...
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
Nari tu narayani
of 83

Nari tu narayani

Published on: Mar 3, 2016
Published in: Spiritual      
Source: www.slideshare.net


Transcripts - Nari tu narayani

  • 1.
  • 2.   ूःतावना  यऽ नायर्ःतु पूज्यन्ते रमन्ते तऽ देवता।  'िजस कु ल में ि यों का आदर है वहाँ देवता प ्रसन ्न रहते हैं।'  इस प ्रकार शा ों में नारी की मिहमा बतायी गयी है। भारतीय समाज में नारी का एक िविशष ्ट व गौरवपूर्ण ःथान  है। वह भो य नहीं है बिल्क पुरुष को भी िशक्षा देने यो य चिरऽ बरत सकती है। अगर वह अपने चिरऽ और साधना में दृढ़ तथा उत्साही बन जाय तो अपने माता, िपता, पित, सास और सुर की भी उ ारक हो सकती है।  धमर् (आचारसंिहता) की ःथापना भले आचाय ने की, पर उसे सँभाले रखना, िवःतािरत करना और बच्चों में उसके संःकारों का िसंचन करना – इन सबका ौेय नारी को जाता है। भारतीय संःकृ ित ने ी को माता के रूप में ःवीकार करके यह बात ूिस की है िक नारी पुरुष के कामोपभोग की साममी नहीं बिल्क वंदनीय, पूजनीय है।  इस पुःतक में परम पूज्य संत ौी आसारामजी बापू के सत्संग-ूवचनों से आदशर् नािरयों के कु छ ऐसे जीवन-ूसंग संमिहत िकये गये हैं िक नािरयाँ यिद इस चयन का बार-बार अवलोकन करेंगी तो उन्हें अवँय लाभ होगा।  ौी योग वेदान्त सेवा सिमित  सतं ौी आसारामजी आौम, अमदावाद।    अनुबम  संयमिनष ्ठ सुयशा.....................................................................................................................................................................5 अदभुत आभासम ्पन ्न रानी कलावती .......................................................................................................................................13 उत ्तम िजज्ञासुः मैऽेयी ............................................................................................................................................................15 ब ्र मवािदनी िवदुषी गाग ........................................................................................................................................................17 अथाह शि  की धनीः तपिःवनी शाण्डािलनी..............................................................................................................................19 सती सािवऽी............................................................................................................................................................................20 माँ सीता की सतीत ्व‐भावना.....................................................................................................................................................22
  • 3. आर्त भक्त िौपदी ..................................................................................................................................................................22 दैवी शि यों से सम ्पन ्न गुणमंजरी देवी....................................................................................................................................24 िववेक की धनीः कमार्वती  व ..........................................................................................................................................................26 वास ्तिवक सौन ्दर्य ................................................................................................................................................................39 आत ्मिव ा की धनीः फु लीबाई..................................................................................................................................................43 आनंदीबाई की दृढ़ श ्र ा...........................................................................................................................................................48 कमार्बाई की वात ्सल ्य‐भि .....................................................................................................................................................50 साध्वी िसरमा..........................................................................................................................................................................51 मु ाबाई का सर्वत ्र िव ठल‐दर्शन.........................................................................................................................................56 रतनबाई की गुरुभि ...............................................................................................................................................................58 ब ्र मलीन ौी माँ महँगीबा........................................................................................................................................................60 मेरी माँ का िदव्य गुरुभाव.....................................................................................................................................................60 'प्रभु ! मुझे जाने दो....' ........................................................................................................................................................61 इच्छाओं से परेः माँ महँगीबा .................................................................................................................................................62 जीवन में कभी फिरयाद नहीं..... ............................................................................................................................................63 बीमारों के  प्रित माँ की करूणा ..............................................................................................................................................63 'कोई कार्य घृिणत नहीं है....' ................................................................................................................................................64 ऐसी माँ के  िलए शोक िकस बात का?......................................................................................................................................64 अम्मा की गुरुिन ा...................................................................................................................................................................66 ःवावलंबन एवं परदःु खकातरता ............................................................................................................................................66 अम्मा में माँ यशोदा जैसा भा ..............................................................................................................................................67
  • 4. द प ेने की िदव्य भावना............................................................................................................................................................67 गरीब कन्याओं के  िववाह में मदद..........................................................................................................................................68 अम्मा का उत्सव ूेम...........................................................................................................................................................68 ्रत्येक वःतु का सदुपयोग होना चािहए................................................................................................................................69 अहं से परे ............................................................................................................................................................................69 मीराबाई की गुरुभि ................................................................................................................................................................70 राजकु मारी मिल्लका बनी तीथकर मिल्लयनाथ .........................................................................................................................72 दुगार्दास की वीर जननी ............................................................................................................................................................73 कर्मिनष ्ठ ँयामो ...................................................................................................................................................................74 शि स ्वरूपा माँ आनंदमयी ......................................................................................................................................................75 अभाव का ही अभाव .................................................................................................................................................................79 माँ अंजना का सामथर््य .............................................................................................................................................................80   लज्जावासो भूषणं शु शीलं पादक्षेपो धमर्माग च यःया।  िनत्यं पत्युः सेवनं िम वाणी धन्या सा ी पूतयत्येव पृथ्वीम ्।।  'िजस ी का लज्जा ही व तथा िवशु भाव ही भूषण हो, धमर्मागर् में िजसका ूवेश हो, मधुर वाणी बोलने का िजसमें गुण हो वह पितसेवा-परायण ौे नारी इस पृथ्वी को पिवऽ करती है।' भगवान शंकर महिषर् गगर् से कहते हैः 'िजस घर में सवर्गुणसंपन्ना नारी सुखपूवर्क िनवास करती है, उस घर में लआमी िनवास करती है। हे वत्स ! कोिट देवता भी उस घर को नहीं छोड़ते।'  नारी का दय कोमल और िःन ध हुआ करता है। इसी वजह से वह जगत की पालक, माता के ःवरूप में हमेशा ःवीकारी गयी है। 'ॄ वैवतर् पुराण' के गणेष खण्ड के 40 वें अध्याय में आया हैः   जनको जन्मदातृत्वात ् पालनाच्च िपता ःमृतः।  गरीयान ् जन्मदातु योऽन्दाता िपता मुने।।  तयोः शतगुणे माता पूज्या मान्या च विन्दता।  गभर्धारणपोषा यां सा च ता यां गरीयसी।।
  • 5. 'जन्मदाता और पालनकतार् होने के कारण सब पूज्यों में पूज्यतम जनक और िपता कहलाता है। जन्मदाता से भी अन्नदाता िपता ौे है। इनसे भी सौगुनी ौे और वंदनीया माता है, क्योंिक वह गभर्धारण तथा पोषण करती है।'  इसिलए जननी एवं जन्मभूिम को ःवगर् से भी ौे बताते हुए कहा गया हैः जननी जन्मभूिम ःवगार्दिप गरीयसी।    संयमिन सुयशा  अमदावाद की घिटत घटना हैः  िवबम संवत ् 17 वीं शताब्दी में कणार्वती (अमदावाद) में युवा राजा पुंपसेन का राज्य था। जब उसकी सवारी िनकलती तो बाजारों में लोग कतारब खड़े रहकर उसके दशर्न करते। जहाँ िकसी सुन्दर युवती पर उसकी नजर पड़ती तब मंऽी को इशारा िमल जाता। रािऽ को वह सुन्दरी महल में पहँुचायी जाती। िफर भले िकसी की कन्या हो अथवा दुल्हन !  एक गरीब कन्या, िजसके िपता का ःवगर्वास हो गया था। उसकी माँ चक्की चलाकर अपना और बेटी का पेट पालती थी। वह ःवयं भी कथा सुनती और अपनी पुऽी को भी सुनाती। हक और पिरौम की कमाई, एकादशी का ोत और भगवन्नाम-जप, इन सबके कारण 16 वष या कन्या का शरीर बड़ा सुगिठत था और रूप लावण्य का तो मानों, अंबार थी ! उसका नाम था सुयशा।  सबके साथ सुयशा भी पुंपसेन को देखने गयी। सुयशा का ओज तेज और रूप लावण्य देखकर पुंपसेन ने अपने मंऽी को इशारा िकया। मंऽी ने कहाः "जो आज्ञा।"   मंऽी ने जाँच करवायी। पता चला िक उस कन्या का िपता है नहीं, माँ गरीब िवधवा है। उसने सोचाः 'यह काम तो सरलता से हो जायेगा।'  मंऽी ने राजा से कहाः "राजन ् ! लड़की को अके ले क्या लाना? उसकी माँ से साथ ले आयें। महल के पास एक कमरे में रहेंगी, झाड़ू-बुहारी करेंगी, आटा पीसेंगी। उनको के वल खाना देना है।"  मंऽी ने युि से सुयशा की माँ को महल में नौकरी िदलवा दी। इसके बाद उस लड़की को महल में लाने की युि याँ खोजी जाने लगीं। उसको बेशम के व िदये। जो व कु कमर् करने के िलए वेँयाओं को पहनकर तैयार रहना होता है, ॆंऽी ने ऐसे व भेजे और कहलवायाः "राजा साहब ने कहा हैः सुयशा ! ये व पहन कर आओ। सुना है िक तुम भजन अच्छा गाती हो अतः आकर हमारा मनोरंजन करो।"  यह सुनकर सुयशा को धक्का लगा ! जो बूढ़ी दासी थी और ऐसे कु कम में साथ देती थी, उसने सुयशा को समझाया िक "ये तो राजािधराज हैं, पुंपसेन महाराज हैं। महाराज के महल में जाना तेरे िलए सौभा य की बात है।" इस तरह उसने और भी बातें कहकर सुयशा को पटाया।
  • 6. सुयशा कै से कहती िक 'मैं भजन गाना नहीं जानती हँू। मैं नहीं आऊँ गी...' राज्य में रहती है और महल के अंदर माँ काम करती है। माँ ने भी कहाः "बेटी ! जा। यह वृ ा कहती है तो जा।"  सुयशा ने कहाः "ठीक है। लेिकन कै से भी करके ये बेशम के व पहनकर तो नहीं जाऊँ गी।  सुयशा सीधे-सादे व पहनकर राजमहल में गयी। उसे देखकर पुंपसेन को धक्का लगा िक 'इसने मेरे भेजे हुए कपड़े नहीं पहने?' दासी ने कहाः "दूसरी बार समझा लूँगी, इस बार नहीं मानी।"  सुयशा का सुयश बाद में फै लेगा, अभी तो अधमर् का पहाड़ िगर रहा था.... धमर् की नन्हीं-सी मोमब ी पर अधमर् का पहाड़...! एक तरफ राजस ा की आँधी है तो दूसरी तरफ धमर्स ा की लौ ! जैसे रावण की राजस ा और िवभीषण की धमर्स ा, दुय धन की राजस ा और िवदुर की धमर्स ा ! िहरण्यकिशपु की राजस ा और ू ाद की धमर्स ा ! धमर्स ा और राजस ा टकरायी। राजस ा चकनाचूर हो गयी और धमर्स ा की जय- जयकार हुई और हो रही है ! िवबम राणा और मीरा.... मीरा की धमर् में दृढ़ता थी। राणा राजस ा के बल पर मीरा पर हावी होना चाहता था। दोनों टकराये और िवबम राणा मीरा के चरणों में िगरा !  धमर्स ा िदखती तो सीधी सादी है लेिकन उसकी नींव पाताल में होती है और सनातन सत्य से जुड़ी होती है जबिक राजस ा िदखने में बड़ी आडम्बरवाली होती है लेिकन भीतर ढोल की पोल की तरह होती है।  राजदरबार के सेवक ने कहाः "राजािधराज महाराज पुंपसेन की जय हो ! हो जाय गाना शुरु।"  पुंपसेनः "आज तो हम के वल सुयशा का गाना सुनेंगे।"  दासी ने कहाः "सुयशा ! गाओ, राजा ःवयं कह रहे हैं।"  राजा के साथी भी सुयशा का सौन्दयर् नेऽों के ारा पीने लगे और राजा के दय में काम-िवकार पनपने लगा। सुयशा राजा के िदये व पहनकर नहीं आयी, िफर भी उसके शरीर का गठन और ओज-तेज बड़ा सुन्दर लग रहा था। राजा भी सुयशा को चेहरे को िनहारे जा रहा था।  कन्या सुयशा ने मन-ही-मन ूभु से ूाथर्ना कीः 'ूभु ! अब तुम्हीं रक्षा करना।'  आपको भी जब धमर् और अधमर् के बीच िनणर्य करना पड़े तो धमर् के अिध ानःवरूप परमात्मा की शरण लेना। वे आपका मंगल ही करते हैं। उन्हींसे पूछना िक 'अब मैं क्या करूँ ? अधमर् के आगे झुकना मत। परमात्मा की शरण जाना।  दासी ने सुयशा से कहाः "गाओ, संकोच न करो, देर न करो। राजा नाराज होंगे, गाओ।"  परमात्मा का ःमरण करके सुयशा ने एक राग छेड़ाः  कब सुिमरोगे राम? साधो ! कब सुिमरोगे राम? अब तुम कब सुिमरोगे राम?  बालपन सब खेल गँवायो, यौवन में काम।  साधो ! कब सुिमरोगे राम? कब सुिमरोगे राम?  पुंपसेन के मुँह पर मानों, थप्पड़ लगा।  सुयशा ने आगे गायाः  हाथ पाँव जब कं पन लागे, िनकल जायेंगे ूाण।
  • 7. कब सुिमरोगे राम? साधो ! कब सुिमरोगे राम?  झूठी काया झूठी माया, आिखर मौत िनशान।  कहत कबीर सुनो भई साधो, जीव दो िदन का मेहमान।  कब सुिमरोगे राम? साधो ! कब सुिमरोगे राम?  भावयु भजन से सुयशा का दय तो राम रस से सराबोर हो गया लेिकन पुंपसेन के रंग में भंग पड़ गया। वह हाथ मसलता ही रह गया। बोलाः 'ठीक है, िफर देखता हँू।'  सुयशा ने िवदा ली। पुंपसेन ने मंिऽयों से सलाह ली और उपाय खोज िलया िक 'अब होली आ रही है उस होिलकोत्सव में इसको बुलाकर इसके सौन्दयर् का पान करेंगे।' राजा ने होली पर सुयशा को िफर से व िभजवाये और दासी से कहाः "कै से भी करके सुयशा को यही व पहनाकर लाना है।" दासी ने बीसों ऊँ िगलयों का जोर लगाया। माँ ने भी कहाः "बेटी ! भगवान तेरी रक्षा करेंगे। मुझे िव ास है िक तू नीच कमर् करने वाली लड़िकयों जैसा न करेगी। तू भगवान की, गुरु की ःमृित रखना। भगवान तेरा कल्याण करें।" महल में जाते समय इस बार सुयशा ने कपड़े तो पहन िलये लेिकन लाज ढाँकने के िलए ऊपर एक मोटी शाल ओढ़ ली। उसे देखकर पुंपसेन को धक्का तो लगा, लेिकन यह भी हुआ िक 'चलो, कपड़े तो मेरे पहनकर आयी है।' राजा ऐसी-वैसी युवितयों से होली खेलते-खेलते सुयशा की ओर आया और उसकी शाल खींची। 'हे राम' करके सुयशा आवाज करती हुई भागी। भागते-भागते माँ की गोद में आ िगरी। "माँ, माँ ! मेरी इज्जत खतरे में है। जो ूजा का पालक है वही मेरे धमर् को न करना चाहता है।"  माँ: "बेटी ! आग लगे इस नौकरी को।" माँ और बेटी शोक मना रहे हैं। इधर राजा बौखला गया िक 'मेरा अपमान....! मैं देखता हँू अब वह कै से जीिवत रहती है?' उसने अपने एक खूँखार आदमी कालू िमयाँ को बुलवाया और कहाः "कालू ! तुझे ःवगर् की उस परी सुयशा का खात्मा करना है। आज तक तुझे िजस-िजस व्यि को खत्म करने को कहा है, तू करके आया है। यह तो तेरे आगे मच्छर है मच्छर है ! कालू ! तू मेरा खास आदमी है। मैं तेरा मुँह मोितयों से भर दँूगा। कै से भी करके सुयशा को उसके राम के पास पहँुचा दे।" कालू ने सोचाः 'उसे कहाँ पर मार देना ठीक होगा?.... रोज ूभात के अँधेरे में साबरमती नदी में ःनान करने जाती है.... बस, नदी में गला दबोचा और काम खत्म...'जय साबरमती' कर देंगे।' कालू के िलए तो बायें हाथ का खेल था लेिकन सुयशा का इ भी मजबूत था। जब व्यि का इ मजबूत होता है तो उसका अिन नहीं हो सकता।  मैं सबको सलाह देता हँू िक आप जप और ोत करके अपना इ इतना मजबूत करो िक बड़ी-से-बड़ी राजस ा भी आपका अिन न कर सके । अिन करने वाले के छक्के छू ट जायें और वे भी आपके इ के चरणों में आ जायें... ऐसी शि आपके पास है।  कालू सोचता हैः 'ूभात के अँधेरे में साबरमती के िकनारे... जरा सा गला दबोचना है, बस। छु रा मारने की जरूरत ही नहीं है। अगर िचल्लायी और जरूरत पड़ी तो गले में जरा-सा छु रा भ ककर 'जय साबरमती' करके
  • 8. रवाना कर दँूगा। जब राजा अपना है तो पुिलस की ऐसी-तैसी... पुिलस क्या कर सकती है? पुिलस के अिधकारी तो जानते हैं िक राजा का आदमी है।'  कालू ने उसके आने-जाने के समय की जानकारी कर ली। वह एक पेड़ की ओट में छु पकर खड़ा हो गया। ज्यों ही सुयशा आयी और कालू ने झपटना चाहा त्यों ही उसको एक की जगह पर दो सुयशा िदखाई दीं। 'कौन सी सच्ची? ये क्या? दो कै से? तीन िदन से सारा सवक्षण िकया, आज दो एक साथ ! खैर, देखता हँू, क्या बात है? अभी तो दोनों को नहाने दो....' नहाकर वापस जाते समय उसे एक ही िदखी तब कालू हाथ मसलता है िक 'वह मेरा ॅम था।' वह ऐसा सोचकर जहाँ िशविलंग था उसी के पास वाले पेड़ पर चढ़ गया िक 'वह यहाँ आयेगी अपने बाप को पानी चढ़ाने... तब 'या अल्लाह' करके उस पर कू दँूगा और उसका काम तमाम कर दँूगा।' उस पेड़ से लगा हुआ िबल्वपऽ का भी एक पेड़ था। सुयशा साबरमती में नहाकर िशविलंग पर पानी चढ़ाने को आयी। हलचल से दो-चार िबल्वपऽ िगर पड़े। सुयशा बोलीः "हे ूभु ! हे महादेव ! सुबह-सुबह ये िजस िबल्वपऽ िजस िनिम से िगरे हैं, आज के ःनान और दशर्न का फल मैं उसके कल्याण के िनिम अपर्ण करती हँू। मुझे आपका सुिमरन करके संसार की चीज नहीं पानी, मुझे तो के वल आपकी भि ही पानी है।" सुयशा का संकल्प और उस बू र-काितल के दय को बदलने की भगवान की अनोखी लीला ! कालू छलाँग मारकर उतरा तो सही लेिकन गला दबोचने के िलए नहीं। कालू ने कहाः "लड़की ! पुंपसेन ने तेरी हत्या करने का काम मुझे स पा था। मैं खुदा की कसम खाकर कहता हँू िक मैं तेरी हत्या के िलए छु रा तैयार करके आया था लेिकन तू... अनदेखे घातक का भी कल्याण करना चाहती है ! ऐसी िहन्दू कन्या को मारकर मैं खुदा को क्या मुँह िदखाऊँ गा? इसिलए आज से तू मेरी बहन है। तू तेरे भैया की बात मान और यहाँ से भाग जा। इससे तेरी भी रक्षा होगी और मेरी भी। जा, ये भोले बाबा तेरी रक्षा करेंगे। िजन भोले बाबा तेरी रक्षा करेंगे, जा, जल्दी भाग जा...." सुयशा को कालू िमयाँ के ारा मानों, उसका इ ही कु छ ूेरणा दे रहा था। सुयशा भागती-भागती बहुत दूर िनकल गयी। जब कालू को हुआ िक 'अब यह नहीं लौटेगी...' तब वह नाटक करता हुआ राजा के पास पहँुचाः "राजन ! आपका काम हो गया वह तो मच्छर थी... जरा सा गला दबाते ही 'मे ऽऽऽ' करती रवाना हो गयी।" राजा ने कालू को ढेर सारी अशिफर् याँ दीं। कालू उन्हें लेकर िवधवा के पास गया और उसको सारी घटना बताते हुए कहाः "माँ ! मैंने तेरी बेटी को अपनी बहन माना है। मैं बू र, कामी, पापी था लेिकन उसने मेरा िदल बदल िदया। अब तू नाटक कर की हाय, मेरी बेटी मर गयी... मर गयी..' इससे तू भी बचेगी, तेरी बेटी भी बचेगी और मैं भी बचूँगा। तेरी बेटी की इज्जत लूटने का ष यंऽ था, उसमें तेरी बेटी नहीं फँ सी तो उसकी हत्या करने का काम मुझे स पा था। तेरी बेटी ने महादेव से ूाथर्ना की िक 'िजस िनिम ये िबल्वपऽ िगरे हैं उसका भी कल्याण हो, मंगल हो।' माँ ! मेरा िदल बदल गया है। तेरी बेटी मेरी बहन है। तेरा यह खूँखार बेटा तुझे ूाथर्ना करता है िक
  • 9. तू नाटक कर लेः 'हाय रेऽऽऽ ! मेरी बेटी मर गयी। वह अब मुझे नहीं िमलेगी, नदी में डूब गयी...' ऐसा करके तू भी यहाँ से भाग जा।" सुयशा की माँ भाग िनकली। उस कामी राजा ने सोचा िक मेरे राज्य की एक लड़की... मेरी अवज्ञा करे ! अच्छा हुआ मर गयी ! उसकी माँ भी अब ठोकरें खाती रहेगी... अब सुमरती रहे वही राम ! कब सुिमरोगे राम? साधो ! कब सुिमरोगे राम? झूठी काया झूठी माया आिखर मौत िनशान ! कब सुिमरोगे राम? साधो ! सब सुिमरोगे राम? हा हा हा हा ऽऽऽ...' मजाक-मजाक में गाते-गाते भी यह भजन उसके अचेतन मन में गहरा उतर गया... कब सुिमरोगे राम? उधर सुयशा को भागते-भागते राःते में माँ काली का एक छोटा-सा मंिदर िमला। उसने मंिदर में जाकर ूणाम िकया। वहाँ की पुजािरन गौतमी ने देखा िक क्या रूप है, क्या सौन्दयर् है और िकतनी नॆता !' उसने पूछाः "बेटी ! कहाँ से आयी हो?" सुयशा ने देखा िक एक माँ तो छू टी, अब दूसरी माँ बड़े प्यार से पूछ रही है... सुयशा रो पड़ी और बोलीः "मेरा कोई नहीं है। अपने ूाण बचाने के िलए मुझे भागना पड़ा।" ऐसा कहकर सुयशा ने सब बता िदया। गौतमीः "ओ हो ऽऽऽ... मुझे संतान नहीं थी। मेरे भोले बाबा ने, मेरी काली माँ ने मेरे घर 16 वषर् की पुऽी भेज दी।" बेटी... बेटी ! कहकर गौतमी ने सुयशा को गले लगा िलया और अपने पित कै लाशनाथ को बताया िक "आज हमें भोलानाथ ने 16 वषर् की सुन्दरी कन्या दी है। िकतनी पिवऽ है। िकतनी भि भाववाली है।" कै लाशनाथः "गौतमी ! पुऽी की तरह इसका लालन-पालन करना, इसकी रक्षा करना। अगर इसकी मज होगी तो इसका िववाह करेंगे नहीं तो यहीं रहकर भजन करे।" जो भगवान का भजन करते हैं उनको िव न डालने से पाप लगता है। सुयशा वहीं रहने लगी। वहाँ एक साधु आता था। साधु भी बड़ा िविचऽ था। लोग उसे 'पागलबाबा' कहते थे। पागलबाबा ने कन्या को देखा तो बोल पड़ेः हँूऽऽऽ..." गौतमी घबरायी िक "एक िशकं जे से िनकलकर कहीं दूसरे में....? पागलबाबा कहीं उसे फँ सा न दे.... हे भगवान ! इसकी रक्षा करना।" ी का सबसे बड़ा शऽु है उसका सौन्दयर् एवं ौृंगार दूसरा है उसकी असावधानी। सुयशा ौृंगार तो करती नहीं थी, असावधान भी नहीं थी लेिकन सुन्दर थी। गौतमी ने अपने पित को बुलाकर कहाः "देखो, ये बाबा बार-बार अपनी बेटी की तरफ देख रहे हैं।" कै लाशनाथ ने भी देखा। बाबा ने लड़की को बुलाकर पूछाः "क्या नाम है?" "सुयशा।" "बहुत सुन्दर हो, बड़ी खूबसूरत हो।" पुजािरन और पुजारी घबराये। बाबा ने िफर कहाः "बड़ी खूबसूरत है।" कै लाशनाथः "महाराज ! क्या है?"
  • 10. "बड़ी खूबसूरत है।" "महाराज आप तो संत आदमी हैं।" "तभी तो कहता हँू िक बड़ी खूबसूरत है, बड़ी होनहार है। मेरी होगी तू?" पुजािरन-पुजारी और घबराये िक 'बाबा क्या कह रहे हैं? पागल बाबा कभी कु छ कहते हैं वह सत्य भी हो जाता है। इनसे बचकर रहना चािहए। क्या पता कहीं....' कै लाशनाथः "महाराज ! क्या बोल रहे हैं।" बाबा ने सुयशा से िफर पूछाः "तू मेरी होगी?"  सुयशाः "बाबा मैं समझी नहीं।"  "तू मेरी सािधका बनेगी? मेरे राःते चलेगी?"  "कौन-सा राःता?"  "अभी िदखाता हँू। माँ के सामने एकटक देख.... माँ ! तेरे राःते ले जा रहा हँू, चलती नहीं है तो तू समझा माँ, माँ !"  लड़की को लगा िक 'ये सचमुच पागल हैं।'  'चल' करके दृि से ही लड़की पर शि पात कर िदया। सुयशा के शरीर में ःपंदन होने लगा, हाःय आिद अ साि वक भाव उभरने लगे।  पागलबाबा ने कै लाशनाथ और गौतमी से कहाः "यह बड़ी खूबसूरत आत्मा है। इसके बा सौन्दयर् पर राजा मोिहत हो गया था। यह ूाण बचाकर आयी है और बच पायी है। तुम्हारी बेटी है तो मेरी भी तो बेटी है। तुम िचन्ता न करो। इसको घर पर अलग कमरे में रहने दो। उस कमरे में और कोई न जाय। इसकी थोड़ी साधना होने दो िफर देखो क्या-क्या होता है? इसकी सुषु शि यों को जगने दो। बाहर से पागल िदखता हँू लेिकन 'गल' को पाकर घूमता हँू, बच्चे।"  "महाराज आप इतने सामथ्यर् के धनी हैं यह हमें पता नहीं था। िनगाहमाऽ से आपने संूेक्षण शि का संचार कर िदया।"  अब तो सुयशा का ध्यान लगने लगा। कभी हँसती है, कभी रोती है। कभी िदव्य अनुभव होते हैं। कभी ूकाश िदखता है, कभी अजपा जप चलता है कभी ूाणायाम से नाड़ी-शोधन होता है। कु छ ही िदनों में मूलाधार, ःवािध ान, मिणपुर के न्ि जामत हो गये।  मूलाधार के न्ि जागृत हो तो काम राम में बदलता है, बोध क्षमा में बदलता है, भय िनभर्यता में बदलता है, घृणा ूेम में बदलती है। ःवािध ान के न्ि जागृत होता है तो कई िसि याँ आती हैं। मिणपुर के न्ि जामत हो तो अपढ़े, अनसुने शा को जरा सा देखें तो उस पर व्या या करने का सामथ्यर् आ जाता है।  आपके से ये सभी के न्ि अभी सुषु हैं। अगर जग जायें तो आपके जीवन में भी यह चमक आ सकती है। हम ःकू ली िव ा तो के वल तीसरी कक्षा तक पढ़े हैं लेिकन ये के न्ि खुलने के बाद देखो, लाखों-करोड़ों लोग सत्संग सुन रहे हैं, खूब लाभािन्वत हो रहे हैं। इन के न्िों में बड़ा खजाना भरा पड़ा है।
  • 11. इस तरह िदन बीते..... स ाह बीते.. महीने बीते। सुयशा की साधना बढ़ती गयी.... अब तो वह बोलती है तो लोगों के दयों को शांित िमलती है। सुयशा का यश फै ला.... यश फै लते-फै लते साबरमती के िजस पार से वह आयी थी, उस पार पहँुचा। लोग उसके पास आते-जाते रहे..... एक िदन कालू िमयाँ ने पूछाः "आप लोग इधर से उधर उस पार जाते हो और एक दो िदन के बाद आते हो क्या बात है?"  लोगों ने बतायाः "उस पार माँ भिकाली का मंिदर है, िशवजी का मंिदर है। वहाँ पागलबाबा ने िकसी लड़की से कहाः 'तू तो बहुत सुन्दर है, संयमी है।' उस पर कृ पा कर दी ! अब वह जो बोलती है उसे सुनकर हमें बड़ी शांित िमलती है, बड़ा आनंद िमलता है।"  "अच्छा, ऐसी लड़की है?"  "उसको लड़की-लड़की मत कहो कालू िमयाँ ! लोग उसको माता जी कहते हैं। पुजािरन और पुजारी भी उसको 'माताजी-माताजी कहते हैं। क्या पता कहाँ से वह ःवगर् को देवी आयी है?"  "अच्छा तो अपन भी चलते हैं।"  कालू िमयाँ ने आकर देखा तो.... "िजस माताजी को लोग मत्था टेक रहे हैं वह वही सुयशा है, िजसको मारने के िलए मैं गया था और िजसने मेरा दय पिरवितर्त कर िदया था।"  जानते हुए भी कालू िमयाँ अनजान होकर रहा, उसके दय को बड़ी शांित िमली। इधर पुंपसेन को मानिसक िखन्नता, अशांित और उ ेग हो गया। भ को कोई सताता है तो उसका पुण्य न हो जाता है, इ कमजोर हो जाता है और देर-सवेर उसका अिन होना शुरु हो जाता है।  संत सताये तीनों जायें तेज, बल और वंश।  पुंपसेन को मिःतंक का बुखार आ गया। उसके िदमाग में सुयशा की वे ही पंि याँ घूमने लगीं-  कब सुिमरोगे राम? साधो ! कब सुिमरोगे राम....  उन पंि यों को गाते-गाते वह रो पड़ा। हकीम, वै सबने हाथ धो डाले और कहाः "राजन ! अब हमारे वश की बात नहीं है।"  कालू िमयाँ को हुआः 'यह चोट जहाँ से लगी है वहीं से ठीक हो सकती है।' कालू िमलने गया और पूछाः "राजन ् ! क्या बात है?"  "कालू ! कालू ! वह ःवगर् की परी िकतना सुन्दर गाती थी। मैंने उसकी हत्या करवा दी। मैं अब िकसको बताऊँ ? कालू ! अब मैं ठीक नहीं हो सकता हँू। कालू ! मेरे से बहुत बड़ी गलती हो गयी !"  "राजन ! अगर आप ठीक हो जायें तो?"  "अब नहीं हो सकता। मैंने उसकी हत्या करवा दी है, कालू उसने िकतनी सुन्दर बात कही थीः  झूठी काया झूठी माया आिखर मौत िनशान !  कहत कबीर सुनो भई साधो, जीव दो िदन का मेहमान।  कब सुिमरोगे राम? साधो ! कब सुिमरोगे राम?
  • 12. और मैंने उसकी हत्या करवा दी। कालू ! मेरा िदल जल रहा है। कमर् करते समय पता नहीं चलता, कालू ! बाद में अन्दर की लानत से जीव तप मरता है। कमर् करते समय यिद यह िवचार िकया होता तो ऐसा नहीं होता। कालू ! मैंने िकतने पाप िकये हैं।"  कालू का दय पसीजा की इस 'राजा को अगर उस देवी की कृ पा िमल जाये तो ठीक हो सकता है। वैसे यह राज्य तो अच्छा चलाना जानता है, दबंग है। पापकमर् के कारण इसको जो दोष लगा है वह अगर धुल जाये तो....' कालू बोलाः "राजन ् ! अगर वह लड़की कहीं िमल जाये तो?" "कै से िमलेगी?" "जीवनदान िमले तो मैं बताऊँ । अब वह लड़की, लड़की नहीं रही। पता नहीं, साबरमती माता ने उसको कै से गोद में ले िलया और वह जोगन बन गयी है। लोग उसके कदमों में अपना िसर झुकाते हैं।"  "हैं.... क्या बोलता है? जोगन बन गयी है? वह मरी नहीं है?"  "नहीं।"  "तूने तो कहा था मर गयी?"  "मैंने तो गला दबाया और समझा मर गयी होगी लेिकन आगे िनकल गयी, कहीं चली गयी और िकसी साधु बाबा की मेहरबानी हो गयी और मेरे को लगता है िक रूपये में 15 आना पक्की बात है िक वही सुयशा है। जोगन का और उसका रूप िमलता है।"  "कालू ! मुझे ले चल। मैं उसके कदमों में अपने दुभार् य को सौभा य में बदलना चाहता हँू। कालू ! कालू!"  राज पहँुचा और उसने प ा ाप के आँसुओं से सुयशा के चरण धो िदये। सुयशा ने कहाः "भैया ! इन्सान गलितयों का घर है, भगवान तुम्हारा मंगल करें।"   पुंपसेनः "देवी ! मेरा मंगल भगवान कै से करेंगे? भगवान मंगल भी करेंगे तो िकसी गुरु के ारा। देवी ! तू मेरी गुरु है, मैं तेरी शरण आया हँू।"  राजा पुंपसेन सुयशा के चरणों में िगरा। वही सुयशा का ूथम िशंय बना। पुंपसेन को सुयशा ने गुरुमंऽ की दीक्षा दी। सुयशा की कृ पा पाकर पुंपसेन भी धनभागी हुआ और कालू भी ! दूसरे लोग भी धनभागी हुए। 17वीं शताब्दी का कणार्वती शहर िजसको आज अमदावाद बोलते हैं, वहाँ की यह एक ऐितहािसक घटना है, सत्य कथा है।  अगर उस 16 वष य कन्या में धमर् के संःकार नहीं होते तो नाच-गान करके राजा का थोड़ा प्यार पाकर ःवयं भी नरक में पच मरती और राजा भी पच मरता। लेिकन उस कन्या ने संयम रखा तो आज उसका शरीर तो नहीं है लेिकन सुयशा का सुयश यह ूेरणा जरूर देता है िक आज की कन्याएँ भी अपने ओज-तेज और संयम की रक्षा करके , अपने ई रीय ूभाव को जगाकर महान आत्मा हो सकती हैं।
  • 13. हमारे देश की कन्याएँ परदेशी भोगी कन्याओं का अनुकरण क्यों करें? लाली-िलपिःटक लगायी... 'बॉयकट' बाल कटवाये... शराब-िसगरेट पी.... नाचा-गाया... धत ् तेरे की ! यह नारी ःवातं य है? नहीं, यह तो नारी का शोषण है। नारी ःवातं य के नाम पर नारी को कु िटल कािमयों की भो या बनाया जा रहा है।  नारी 'ःव' के तंऽ हो, उसको आित्मक सुख िमले, आित्मक ओज बढ़े, आित्मक बल बढ़े, तािक वह ःवयं को महान बने ही, साथ ही औरों को भी महान बनने की ूेरणा दे सके ... अंतरात्मा का, ःव-ःवरूप का सुख िमले, ःव-ःवरूप का ज्ञान िमले, ःव-ःवरूप का सामथ्यर् िमले तभी तो नारी ःवतंऽ है। परपुरुष से पटायी जाय तो ःवतंऽता कै सी? िवषय िवलास की पुतली बनायी जाये तो ःवतन्ऽता कै सी?  कब सुिमरोगे राम?.... संत कबीर के इस भजन ने सुयशा को इतना महान बना िदया िक राजा का तो मंगल िकया ही... साथ ही कालू जैसे काितल दय भी पिरवितर्त कर िदया.. और न जाने िकतनों को ई र की ओर लगाया होगा, हम लोग िगनती नहीं कर सकते। जो ई र के राःते चलता है उसके ारा कई लोग अच्छे बनते हैं और जो बुरे राःते जाता है उसके ारा कइयों का पतन होता है।  आप सभी सदभागी हैं िक अच्छे राःते चलने की रूिच भगवान ने जगायी। थोड़ा-बहुत िनयम ले लो, रोज थोड़ा जप करो, ध्यान करे, मौन का आौय लो, एकादशी का ोत करो.... आपकी भी सुषु शि याँ जामत कर दें, ऐसे िकसी सत्पुरुष का सहयोग लो और लग जाओ। िफर तो आप भी ई रीय पथ के पिथक बन जायेंगे, महान परमे रीय सुख को पाकर धन्य-धन्य हो जायेंगे।  (इस ूेरणापद सत्संग कथा की ऑिडयो कै सेट एवं वी.सी.डी. - 'सुयशाः कब सुिमरोगे राम?'  नाम से उपलब्ध है, जो अित लोकिूय हो चुकी है। आप इसे अवँय सुनें देखें। यह सभी संत ौी आसारामजी आौमों एवं सिमितयों के सेवा के न्िों पर उपलब्ध है।)   ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ अनुबम अदभुत आभासम्पन्न रानी कलावती 'ःकन्द पुराण' के ॄ ो र खंड में कथा आती है िक 'काशीनरेश की कन्या कलावती के साथ मथुरा के दाशाहर् नामक राजा का िववाह हुआ। िववाह के बाद राजा ने रानी को अपने पलंग पर बुलाया लेिकन उसने इन्कार कर िदया। तब राजा ने बल ूयोग की धमकी दी। रानी ने कहाः " ी के साथ संसार-व्यवहार करना हो तो बलूयोग नहीं, ःनेह ूयोग करना चािहए। नाथ ! मैं भले आपकी रानी हँू, लेिकन आप मेरे साथ बलूयोग करके संसार-व्यवहार न करें।"  लेिकन वह राजा था। रानी की बात सुनी-अनसुनी करके नजदीक गया। ज्यों ही उसने रानी का ःपशर् िकया, त्यों ही उसे िव ुत जैसा करंट लगा। उसका ःपशर् करते ही राजा का अंग-अंग जलने लगा। वह दूर हटा और बोलाः "क्या बात है? तुम इतनी सुन्दर और कोमल हो िफर भी तुम्हारे शरीर के ःपशर् से मुझे जलन होने लगी?"
  • 14. रानीः "नाथ ! मैंने बाल्यकाल में दुवार्सा ऋिष से िशवमंऽ िलया था। उसे जपने से मेरी साि वक ऊजार् का िवकास हुआ है, इसीिलए मैं आपके नजदीक नहीं आती थी। जैसे अंधेरी रात और दोपहर एक साथ नहीं रहते, वैसे ही आपने शराब पीनेवाली वेँयाओं के साथ और कु लटाओं के साथ जो संसार-भोग भोगे हैं उससे आपके पाप के कण आपके शरीर, मन तथा बुि में अिधक हैं और मैंने जप िकया है उसके कारण मेरे शरीर में ओज, तेज व आध्याित्मक कण अिधक हैं। इसीिलए मैं आपसे थोड़ी दूर रहकर ूाथर्ना करती थी। आप बुि मान हैं, बलवान हैं, यशःवी हैं और धमर् की बात भी आपने सुन रखी है, लेिकन आपने शराब पीनेवाली वेँयाओं और कु लटाओं के साथ भोग भी भोगे हैं।"  राजाः "तुम्हें इस बात का पता कै से चल गया?"  रानीः "नाथ ! दय शु होता है तो यह याल आ जाता है।"  राजा ूभािवत हुआ और रानी से बोलाः "तुम मुझे भी भगवान िशव का वह मंऽ दे दो।"  रानीः "आप मेरे पित हैं, मैं आपकी गुरु नहीं बन सकती। आप और हम गगार्चायर् महाराज के पास चलें।"   दोनों गगार्चायर् के पास गये एवं उनसे ूाथर्ना की। गगार्चायर् ने उन्हें ःनान आिद से पिवऽ होने के िलए कहा और यमुना तट पर अपने िशवःवरूप के ध्यान में बैठकर उन्हें िनगाह से पावन िकया, िफर िशवमंऽ देकर शांभवी दीक्षा से राजा के ऊपर शि पात िकया।  कथा कहती है िक देखते ही देखते राजा के शरीर से कोिट-कोिट कौए िनकल-िनकल कर पलायन करने लगे। काले कौए अथार्त ् तुच्छ परमाणु। काले कम के तुच्छ परमाणु करोड़ों की सं या में सूआमदृि के ि ाओं ारा देखे गये। सच्चे संतों के चरणों में बैठकर दीक्षा लेने वाले सभी साधकों को इस ूकार के लाभ होते ही हैं। मन, बुि में पड़े हुए तुच्छ कु संःकार भी िमटते हैं। आत्म-परमात्मूाि की यो यता भी िनखरती है। व्यि गत जीवन में सुख शांित, सामािजक जीवन में सम्मान िमलता है तथा मन-बुि में सुहावने संःकार भी पड़ते हैं और भी अनिगनत लाभ होते हैं जो िनगुरे, मनमुख लोगों की कल्पना में भी नहीं आ सकते। मंऽदीक्षा के ूभाव से हमारे पाँचों शरीरों के कु संःकार व काले कम के परमाणु क्षीण होते जाते हैं। थोड़ी ही देर में राजा िनभार्र हो गया एवं भीतर के सुख से भर गया।  शुभ-अशुभ, हािनकारक एवं सहायक जीवाणु हमारे शरीर में रहते हैं। जैसे पानी का िगलास होंठ पर रखकर वापस लायें तो उस पर लाखों जीवाणु पाये जाते हैं यह वैज्ञािनक अभी बोलते हैं। लेिकन शा ों ने तो लाखों वषर् पहले ही कह िदयाः  सुमित-कु मित सबके उर रहिहं।  जब आपके अंदर अच्छे िवचार रहते हैं तब आप अच्छे काम करते हैं और जब भी हलके िवचार आ जाते हैं तो आप न चाहते हुए भी गलत कर बैठते हैं। गलत करने वाला कई बार अच्छा भी करता है तो मानना पड़ेगा िक मनुंय-शरीर पुण्य और पाप का िमौण है। आपका अंतःकरण शुभ और अशुभ का िमौण है। जब आप लापरवाह होते हैं तो अशुभ बढ़ जाते हैं अतः पुरुषाथर् यह करना है िक अशुभ क्षीण होता जाय और शुभ पराका ा तक परमात्म-ूाि तक पहँुच जाय।
  • 15. ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ अनुबम लोग घरबार छोड़कर साधना करने के िलए साधु बनते हैं। घर में रहते हुए, गृहःथधमर् िनभाते हुए नारी ऐसी उम साधना कर सकती है िक अन्य साधुओं की साधना उसके सामने फीकी पड़ जाय। ऐसी देिवयों के पास एक पितोता-धमर् ही ऐसा अमोघ श है, िजसके सम्मुख बड़े-बड़े वीरों के श भी कु िण्ठत हो जाते हैं। पितोता ी अनायास ही योिगयों के समान िसि ूा कर लेती है, इसमें िकं िचत ् माऽ भी संदेह नहीं है। उ म िजज्ञासुः मैऽेयी महिषर् याज्ञवल्क्यजी की दो पि याँ थीः मैऽेयी और कात्यायनी। मैऽेयी ज्ये थी। कात्यायनी की ूज्ञा सामान्य ि यों जैसी ही थी िकं तु मैऽेयी ॄ वािदनी थी। एक िदन याज्ञवाल्क्यजी ने अपनी दोनों पि यों को अपने पास बुलाया और कहाः "मेरा िवचार अब संन्यास लेने का है। अतः इस ःथान को छोड़कर मैं अन्यऽ चला जाऊँ गा। इसके िलए तुम लोगों की अनुमित लेना आवँयक है। साथ ही, मैं यह भी चाहता हँू िक घर में जो कु छ धन-दौलत है उसे तुम दोनों में बराबर- बराबर बाँट दँू तािक मेरे चले जाने के बाद इसको लेकर आपसी िववाद न हो।" यह सुनकर कात्यायनी तो चुप रही िकं तु मैऽेयी ने पूछाः "भगवन ् ! यिद यह धन-धान्य से पिरपूणर् सारी पृथ्वी के वल मेरे ही अिधकार में आ जाय तो क्या मैं उससे िकसी ूकार अमर हो सकती हँू?" याज्ञवल्क्यजी ने कहाः "नहीं। भोग-सामिमयों से संपन्न मनुंयों का जैसा जीवन होता है, वैसा ही तुम्हारा भी जीवन हो जायेगा। धन से कोई अमर हो जाय, उसे अमरत्व की ूाि हो जाय, यह कदािप संभव नहीं है।" तब मैऽेयी ने कहाः "भगवन ् ! िजससे मैं अमर नहीं हो सकती उसे लेकर क्या करूँ गी? यिद धन से ही वाःतिवक सुख िमलता तो आप उसे छोड़कर एकान्त अरण्य में क्यों जाते? आप ऐसी कोई वःतु अवँय जानते हैं, िजसके सामने इस धन एवं गृहःथी का सारा सुख तुच्छ ूतीत होता है। अतः मैं भी उसी को जानना चाहती हँू। यदेव भगवान वेद तदेव मे ॄूिह। के वल िजस वःतु को आप ौीमान अमरत्व का साधन जानते हैं, उसी का मुझे उपदेश करें।" मैऽेयी की यह िजज्ञासापूणर् बात सुनकर याज्ञवल्क्यजी को बड़ी ूसन्नता हुई। उन्होंने मैऽेयी की ूशंसा करते हुए कहाः "धन्य मैऽेयी ! धन्य ! तुम पहले भी मुझे बहुत िूय थी और इस समय भी तुम्हारे मुख से यह िूय वचन ही िनकला है। अतः आओ, मेरे समीप बैठो। मैं तुम्हें त व का उपदेश करता हँू। उसे सुनकर तुम उसका मनन और िनिदध्यासन करो। मैं जो कु छ कहँू, उस पर ःवयं भी िवचार करके उसे दय में धारण करो।"
  • 16. इस ूकार कहकर महिषर् याज्ञवल्क्यजी ने उपदेश देना आरंभ िकयाः "मैऽेयी ! तुम जानती हो िक ी को पित और पित को ी क्यों िूय है? इस रहःय पर कभी िवचार िकया है? पित इसिलए िूय नहीं है िक वह पित है, बिल्क इसिलए िूय है िक वह अपने को संतोष देता है, अपने काम आता है। इसी ूकार पित को ी भी इसिलए िूय नहीं होती िक वह ी है, अिपतु इसिलए िूय होती है िक उससे ःवयं को सुख िमलता। इसी न्याय से पुऽ, धन, ॄा ण, क्षिऽय, लोक, देवता, समःत ूाणी अथवा संसार के संपूणर् पदाथर् भी आत्मा के िलए िूय होने से ही िूय जान पड़ते हैं। अतः सबसे िूयतम वःतु क्या है? अपना आत्मा। आत्मा वा अरे ि व्यः ौोतव्यो मन्तव्यो िनिदध्यािसतव्यो मैऽेयी आत्मनो वा अरे दशर्नेन ौवणेन मत्या िवज्ञानेनेदं सव िविदतम ्। मैऽेयी ! तुम्हें आत्मा की ही दशर्न, ौवण, मनन और िनिदध्यासन करना चािहए। उसी के दशर्न, ौवण, मनन और यथाथर्ज्ञान से सब कु छ ज्ञात हो जाता है।" (बृहदारण्यक उपिनषद् 4-6) तदनंतर महिषर् याज्ञवल्क्यजी ने िभन्न-िभन्न दृ ान्तों और युि यों के ारा ॄ ज्ञान का गूढ़ उपदेश देते हुए कहाः "जहाँ अज्ञानावःथा में ैत होता है, वहीं अन्य अन्य को सूँघता है, अन्य अन्य का रसाःवादन करता है, अन्य अन्य का ःपशर् करता है, अन्य अन्य का अिभवादन करता है, अन्य अन्य का मनन करता है और अन्य अन्य को िवशेष रूप से जानता है। िकं तु िजसके िलए सब कु छ आत्मा ही हो गया है, वह िकसके ारा िकसे देखे? िकसके ारा िकसे सुने? िकसके ारा िकसे सूँघे? िकसके ारा िकसका रसाःवादन करे? िकसके ारा िकसका ःपशर् करे? िकसके ारा िकसका अिभवादन करे और िकसके ारा िकसे जाने? िजसके ारा पुरुष इन सबको जानता है, उसे िकस साधन से जाने? इसिलए यहाँ 'नेित-नेित' इस ूकार िनदश िकया गया है। आत्मा अमा है, उसको महण नहीं िकया जाता। वह अक्षर है, उसका क्षय नहीं होता। वह असंग है, वह कहीं आस नहीं होता। वह िनबर्न्ध है, वह कभी बन्धन में नहीं पड़ता। वह आनंदःवरूप है, वह कभी व्यिथत नहीं होता। हे मैऽेयी ! िवज्ञाता को िकसके ारा जानें? अरे मैऽेयी ! तुम िन यपूवर्क इसे समझ लो। बस, इतना ही अमरत्व है। तुम्हारी ूाथर्ना के अनुसार मैंने ज्ञातव्य त व का उपदेश दे िदया।" ऐसा उपदेश देने के प ात ् याज्ञवल्क्यजी संन्यासी हो गये। मैऽेयी यह अमृतमयी उपदेश पाकर कृ ताथर् हो गयी। यही यथाथर् संपि है िजसे मैऽेयी ने ूा िकया था। धन्य है मैऽेयी ! जो बा धन-संपि से ूा सुख को तृणवत ् समझकर वाःतिवक संपि को अथार्त ् आत्म-खजाने को पाने का पुरुषाथर् करती है। काश ! आज की नारी मैऽेयी के चिरऽ से ूेरणा लेती.... (कल्यान के नारी अंक एवं बृहदारण्यक उपिनषद् पर आधािरत) ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
  • 17. अनुबम ॄ वािदनी िवदुषी गाग ॄ वािदनी िवदुषी गाग का नाम वैिदक सािहत्य में अत्यंत िव यात है। उनका असली नाम क्या था, यह तो ज्ञात नहीं है िकं तु उनके िपता का नाम वचक्नु था। अतः वचक्नु की पुऽी होने के कारण उनका नाम 'वाचक्नवी' पड़ गया। गगर् गोऽ में उत्पन्न होने के कारण लोग उन्हें गाग कहते थे। यह गाग नाम ही जनसाधारण से ूचिलत हुआ।  'बृहदारण्यक उपिनषद् में गाग के शा ाथर् का ूसंग विणर्त हैः  िवदेह देश के राजा जनक ने एक बहुत बड़ा ज्ञानयज्ञ िकया था। उसमें कु रु और पांचाल देश के अनेकों िव ान ॄा ण एकिऽत हुए थे। राजा जनक बड़े िव ा-व्यासंगी एवं सत्संगी थे। उन्हें शा के गूढ़ त वों का िववेचन एवं परमाथर्-चचार् ही अिधक िूय थी। इसिलए उनके मन में यह जानने की इच्छा हुई िक यहाँ आये हुए िव ान ॄा णों में सबसे बढ़कर ताि वक िववेचन करने वाला कौन है? इस परीक्षा के िलए उन्होंने अपनी गौशाला में एक हजार गौएँ बँधवा दीं। सब गौओं के सींगों पर दस-दस पाद (एक ूाचीन माप-कषर्) सुवणर् बँधा हुआ था। यह व्यवःथा करके राजा जनक ने उपिःथत ॄा ण-समुदाय से कहाः  "आप लोगों में से जो सबसे बढ़कर ॄ वे ा हो, वह इन सभी गौओं को ले जाये।"  राजा जनक की यह घोषणा सुनकर िकसी भी ॄा ण में यह साहस नहीं हुआ िक उन गौओं को ले जाय। सब सोचने लगे िक 'यिद हम गौएँ ले जाने को आगे बढ़ते हैं तो ये सभी ॄा ण हमें अिभमानी समझेंगे और शा ाथर् करने लगेंगे। उस समय हम इन सबको जीत सकें गे या नहीं, क्या पता? यह िवचार करते हुए सब चुपचाप ही बैठे रहे।  सबको मौन देखकर याज्ञवल्क्यजी ने अपने ॄ चारी सामौवा से कहाः "हे सौम्य ! तू इन सब गौओं को हाँक ले चल।"  ॄ चारी ने आज्ञा पाकर वैसा ही िकया। यह देखकर सब ॄा ण क्षुब्ध हो उठे। तब िवदेहराज जनक के होता अ ल याज्ञवल्क्यजी से पूछ बैठेः "क्यों? क्या तुम्हीं ॄ िन हो? हम सबसे बढ़कर ॄ वे ा हो?  यह सुनकर याज्ञवल्क्यजी ने नॆतापूवर्क कहाः  "नहीं, ॄ वे ाओं को तो हम नमःकार करते हैं। हमें के वल गौओं की आवँयकता है, अतः गौओं को ले जाते हैं।"   िफर क्या था? शा ाथर् आरंभ हो गया। यज्ञ का ूत्येक सदःय याज्ञवल्क्यजी से ू पूछने लगा। याज्ञवाल्क्यजी इससे िवचिलत नहीं हुए। वे धैयर्पूवर्क सभी के ू ों का बमशः उ र देने लगे। अ ल ने चुन- चुनकर िकतने ही ू िकये, िकं तु उिचत उ र िमल जाने के कारण वे चुप होकर बैठ गये। तब जरत्कारू गोऽ में उत्पन्न आतर्भाग ने ू िकया। उनको भी अपने ू का यथाथर् उ र िमल गया, अतः वे भी मौन हो गये। िफर बमशः ला ायिन भुज्यु, चाबायम उषःत एवं कौषीतके य कहोल ू करके चुप होकर बैठ गये। इसके बाद
  • 18. वाचक्नवी गाग ने पूछाः "भगवन ! यह जो कु छ पािथर्व पदाथर् हैं, वे सब जल में ओत ूोत हैं। जल िकसमें ओतूोत है?  याज्ञवल्क्यजीः "जल वायु में ओतूोत है।"  "वायु िकसमें ओतूोत है?"  "अन्तिरक्षलोक में।"  "अन्तिरक्षलोक िकसमें ओतूोत है?"  "गन्धवर्लोक में।"  "गन्धवर्लोक िकसमें ओतूोत है?"  "आिदत्यलोक में।"  "आिदत्यलोक िकसमें ओतूोत है?"  "चन्िलोक में।"  "चन्िलोक िकसमें ओतूोत है?"  नक्षऽलोक में।"  "नक्षऽलोक िकसमें ओतूोत है?"  "देवलोक में।"  "देवलोक िकसमें ओतूोत है?"  "इन्िलोक में।"  "इन्िलोक िकसमें ओतूोत है?"  "ूजापितलोक में।"  "ूजापितलोक िकसमें ओतूोत है?"  "ॄ लोक में।"  "ॄ लोक िकसमें ओतूोत है?"  इस पर याज्ञवल्क्यजी ने कहाः "हे गाग ! यह तो अितू है। यह उ र की सीमा है। अब इसके आगे ू नहीं हो सकता। अब तू ू न कर, नहीं तो तेरा मःतक िगर जायेगा।"   गाग िवदुषी थीं। उन्होंने याज्ञवल्क्यजी के अिभूाय को समझ िलया एवं मौन हो गयीं। तदनन्तर आरुिण आिद िव ानों ने ू ो र िकये। इसके प ात ् पुनः गाग ने समःत ॄा णों को संबोिधत करते हुए कहाः "यिद आपकी अनुमित ूा हो जाय तो मैं याज्ञवल्क्यजी से दो ू पूछँू । यिद वे उन ू ों का उ र दे देंगे तो आप लोगों में से कोई भी उन्हें ॄ चचार् में नहीं जीत सके गा।"  ॄा णों ने कहाः "पूछ लो गाग !"  तब गाग बोलीः "याज्ञवल्क्यजी ! वीर के तीर के समान ये मेरे दो ू हैं। पहला ू हैः ुलोक के ऊपर, पृथ्वी का िनम्न, दोनों का मध्य, ःवयं दोनों और भूत भिवंय तथा वतर्मान िकसमें ओतूोत हैं?"  याज्ञवल्क्यजीः "आकाश में।"
  • 19. गाग ः "अच्छा... अब दूसरा ू ः यह आकाश िकसमें ओतूोत है?"  याज्ञवल्क्यजीः "इसी त व को ॄ वे ा लोग अक्षर कहते हैं। गाग यह न ःथूल है न सूआम, न छोटा है न बड़ा। यह लाल, िव, छाया, तम, वायु, आकाश, संग, रस, गन्ध, नेऽ, कान, वाणी, मन, तेज, ूाण, मुख और माप से रिहत है। इसमें बाहर भीतर भी नहीं है। न यह िकसी का भो ा है न िकसी का भो य।"  िफर आगे उसका िवशद िनरूपण करते हुए याज्ञवल्क्यजी बोलेः "इसको जाने िबना हजारों वष को होम, यज्ञ, तप आिद के फल नाशवान हो जाते हैं। यिद कोई इस अक्षर त व को जाने िबना ही मर जाय तो वह कृ पण है और जान ले तो यह ॄ वे ा है।  यह अक्षर ॄ दृ नहीं, ि ा है। ौुत नहीं, ौोता है। मत नहीं, मन्ता है। िवज्ञात नहीं, िवज्ञाता है। इससे िभन्न कोई दूसरा ि ा, ौोता, मन्ता, िवज्ञाता नहीं है। गाग ! इसी अक्षर में यह आकाश ओतूोत है।"  गाग याज्ञवल्क्यजी का लोहा मान गयी एवं उन्होंने िनणर्य देते हुए कहाः "इस सभा में याज्ञवल्क्यजी से बढ़कर ॄ वे ा कोई नहीं है। इनको कोई परािजत नहीं कर सकता। हे ॄा णो ! आप लोग इसी को बहुत समझें िक याज्ञवल्क्यजी को नमःकार करने माऽ से आपका छु टकारा हुए जा रहा है। इन्हें परािजत करने का ःवप्न देखना व्यथर् है।"  राजा जनक की सभा ! ॄ वादी ऋिषयों का समूह ! ॄ सम्बन्धी चचार् ! याज्ञवल्क्यजी की परीक्षा और परीक्षक गाग ! यह हमारी आयर् के नारी के ॄ ज्ञान की िवजय जयन्ती नहीं तो और क्या है?  िवदुषी होने पर भी उनके मन में अपने पक्ष को अनुिचत रूप से िस करने का दुरामह नहीं था। ये िव तापूणर् उ र पाकर संतु हो गयीं एवं दूसरे की िव ता की उन्होंने मु कण्ठ से ूशंसा भी की।  धन्य है भारत की आयर् नारी ! जो याज्ञवल्क्यजी जैसे महिषर् से भी शा ाथर् करनें िहचिकचाती नहीं है। ऐसी नारी, नारी न होकर साक्षात ् नारायणी ही है, िजनसे यह वसुन्धरा भी अपने-आपको गौरवािन्वत मानती है।   ('कल्याण' के 'नारी अंक' एवं बृहदारण्यक उपिनषद् पर आधािरत)  ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ अनुबम अथाह शि की धनीः तपिःवनी शाण्डािलनी  शाण्डािलनी का रूप-लावण्य और सौन्दयर् देखकर गालव ऋिष और गरूड़जी मोिहत हो गये। 'ऐसी सुन्दरी और इतनी तेजिःवनी ! वह भी धरती पर तपःयारत ! यह ी तो भगवान िवंणु की भायार् होने के यो य है....' ऐसा सोचकर उन्होंने शाण्डािलनी के आगे यह ूःताव रखा।  शाण्डािलनीः "नहीं नहीं, मुझे तो ॄ चयर् का पालन करना है।"  यह कहकर शाण्डािलनी पुनः तपःयारत हो गयी और अपने शु -बु ःवरूप की ओर याऽा करने लगी।
  • 20. गालवजी और गरुड़जी का यह देखकर पुनः िवचारने लगे िक 'अप्सराओं को भी मात कर देने वाले सौन्दयर् की ःवािमनी यह शाण्डािलनी अगर तपःया में ही रत रही तो जोगन बन जायेगी और हम लोगों की बात मानेगी नहीं। अतः इसे अभी उठाकर ले चलें और भगवान िवंणु के साथ जबरन इसकी शादी करवा दें।'  एक ूभात को दोनों शाण्डािलनी को ले जाने के िलए आये। शाण्डािलनी की दृि जैसे ही उन दोनों पर पड़ी तो वह समझ गयी िक 'अपने िलए तो नहीं, िकं तु अपनी इच्छा पूरी करने के िलए इनकी नीयत बुरी हुई है। जब मेरी कोई इच्छा नहीं है तो मैं िकसी की इच्छा के आगे क्यों दबूँ? मुझे तो ॄ चयर् ोत का पालन करना है िकं तु ये दोनों मुझे जबरन गृहःथी में घसीटना चाहते हैं। मुझे िवंणु की प ी नहीं बनना, वरन ् मुझे तो िनज ःवभाव को पाना है।'  गरुड़जी तो बलवान थे ही, गालवजी भी कम नहीं थे। िकं तु शाण्डािलनी की िनःःवाथर् सेवा, िनःःवाथर् परमात्मा में िवौािन्त की याऽा ने उसको इतना तो सामथ्यर्वान बना िदया था िक उसके ारा पानी के छींटे मार कर यह कहते ही िक 'गालव ! तुम गल जाओ और गालव को सहयोग देने वाले गरुड़ ! तुम भी गल जाओ।' दोनों को महसूस होने लगा िक उनकी शि क्षीण हो रही है। दोनों भीतर-ही-भीतर गलने लगे।  िफर दोनों ने बड़ा ूायि त िकया और क्षमायाचना की, तब भारत की उस िदव्य कन्या शाण्डािलनी ने उन्हें माफ िकया और पूवर्वत ् कर िदया। उसी के तप के ूभाव से 'गलते र तीथर्' बना है।  हे भारत की देिवयो ! उठो.... जागो। अपनी आयर् नािरयों की महानता को, अपने अतीत के गौरव को याद करो। तुममें अथाह सामथ्यर् है, उसे पहचानो। सत्संग, जप, परमात्म-ध्यान से अपनी छु पी हुई शि यों को जामत करो।  जीवनशि का ॑ास करने वाली पा ात्य संःकृ ित के अंधानुकरण से बचकर तन-मन को दूिषत करने वाली फै शनपरःती एवं िवलािसता से बचकर अपने जीवन को जीवनदाता के पथ पर अमसर करो। अगर ऐसा कर सको तो वह िदन दूर नहीं, जब िव तुम्हारे िदव्य चिरऽ का गान कर अपने को कृ ताथर् मानेगा।  ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ अनुबम   सती सािवऽी  'महाभारत' के वन पवर् में सािवऽी और यमराज के वातार्लाप का ूसंग आता हैः  जब यमराज सत्यवान (सािवऽी के पित) के ूाणों को अपने पाश में बाँध ले चले, तब सािवऽी भी उनके पीछे-पीछे चलने लगी। उसे अपने पीछे आते देखकर यमराज ने उसे वापस लौट जाने के िलए कई बार कहा िकं तु सािवऽी चलती ही रही एवं अपनी धमर्चचार् से उसने यमराज को ूसन्न कर िलया।
  • 21. सािवऽी बोलीः "सत्पुरुषों का संग एक बार भी िमल जाये तो वह अभी की पूितर् कराने वाला होता है और यिद उनसे ूेम हो जाये तो िफर कहना ही क्या? संत-समागम कभी िनंफल नहीं जाता। अतः सदा सत्पुरुषों के साथ ही रहना चािहए।  देव ! आप सारी ूजा का िनयमन करने वाले हैं, अतः 'यम' कहलाते हैं। मैंने सुना है िक मन, वचन और कमर् ारा िकसी भी ूाणी के ूित िोह न करके सब पर समान रूप से दया करना और दान देना ौे पुरुषों का सनातन धमर् है। यों तो संसार के सभी लोग सामान्यतः कोमलता का बतार्व करते हैं िकं तु जो ौे पुरुष हैं, वे अपने पास आये हुए शऽु पर भी दया ही करते हैं।" यमराजः "कल्याणी ! जैसे प्यासे को पानी िमलने से तृि होती है, उसी ूकार तेरी धमार्नुकू ल बातें सुनकर मुझे ूसन्नता होती है।" सािविऽ ने आगे कहाः "िववःवान (सूयर्देव) के पुऽ होने के नाते आपको 'वैवःवत' कहते हैं। आप शऽु- िमऽ आिद के भेद को भुलाकर सबके ूित समान रूप से न्याय करते हैं और आप 'धमर्राज' कहलाते हैं। अच्छे मनुंयों को सत्य पर जैसा िव ास होता है, वैसा अपने पर भी नहीं होता। अतएव वे सत्य में ही अिधक अनुराग रखते हैं िव ास की सौहादर् का कारण है तथा सौहादर् ही िव ास का। सत्पुरुषों का भाव सबसे अिधक होता है, इसिलए उन पर सभी िव ास करते हैं।" यमराजः "सािवऽी ! तूने जो बातें कही हैं वैसी बातें मैंने और िकसी के मुँह से नहीं सुनी हैं। अतः मेरी ूसन्नता और भी बढ़ गयी है। अच्छा, अब तू बहुत दूर चली आयी है। जा, लौट जा।" िफर भी सािवऽी ने अपनी धािमर्क चचार् बंद नहीं की। वह कहती गयीः "सत्पुरुषों का मन सदा धमरी1

Related Documents